Sunday, 14 April 2019

Hello dosto

Hello dosto mera naam Rachna Negi hai mein ek house wife hu mein is blog k thru apse life k kuch phelu shre krungi

मेरी यह नई रचना🌹

मैं छोड़ चली तेरी नगरी बाबुल

चली पिया संग बनके बुलबुल।

       ये कूचे-राहें, अचल-आंगन

        चिर निंदिया में सो जाएंगे

मेरी पैजनियों की झंकार बिन

ये अब कभी न जाग पाएंगे।

        इक अजनबी चमन मे खिलूंगी सदा के लिए

        नाचूंगी गाऊंगी खिलखिलाऊंगी उन्हीं के लिए।

सूरज की लालिमा संग नूतन सवेरा-बसेरा जहां

बचपन की किलकारी नहीं जिम्मेदारी होगी वहां।

       मेरी मां! बिन रंग-गुलाल बासंती होली आएगी

       अमावस सा अंधेरा होगा न रोशन होगी दिवाली।

वीरान सी वादियों में न लगेंगे अब मेले

न महकेगी बगिया न गुंजन करेंगे भंवरे।

           चहूं ओर सिर्फ सोज-ए-गम यहां

           उदासी सी छाएगी न जलेगे समां।

तन्हाई में झरते निर्झर, सिसकती सरिता

चुभने लगी मंद पुरवया, रूठने लगे पर्वत।

          मेरी याद में अश्क बहा रहा वो पनघट

          तड़प उठा पपीहा, प्यासी हुई घटिका।

लहलहाते खेत खलिहान बन गये रेगिस्तान

अंबिया की डाल से ओझल हुआ मधुर गान।

     ढलती जिदंगी के इस मोड़ पर, सुन आहट

    मेरे आने की, बूढ़ी आंखें आपकी पथरा गई,

न कोई सहारा वहां अब परिंदे भी नहीं।

बेबस, क्या करूं, क्या कहूं, दूर मेरा देश।

    जाने कितनी सिद्दत से बसाया था  घर-संसार

     इसी में समाने का आपको इंतजार है बाबुल।